सुधीर मिश्रा
स्वतंत्र लेखक एवं सांस्कृतिक विषयों के अध्येता
(शिवपुरी, म.प्र.)
जब 2023 में ब्रिटेन की महारानी कैमिला ने अपने राज्याभिषेक में कोहिनूर हीरा पहनने से परहेज़ किया, तो भारत में इसे प्रतीकात्मक “विजय” के रूप में देखा गया। लेकिन असली लड़ाई अभी बाकी है — वह लड़ाई, जो केवल हीरे या मूर्तियों की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान, ऐतिहासिक न्याय और राष्ट्रीय आत्म-सम्मान की है।
हजार वर्षों की लूट: एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत सदियों से विज्ञान, कला, दर्शन और आध्यात्मिक समृद्धि का स्रोत रहा है, लेकिन साथ ही इसे लगातार विदेशी हमलों, लूट और औपनिवेशिक शोषण का सामना करना पड़ा। इन हमलों ने न केवल आर्थिक नुकसान पहुँचाया, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा पर भी आघात किया।
712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम से लेकर 18वीं सदी के नादिर शाह और फिर ब्रिटिश साम्राज्य तक—भारत को सुनियोजित तरीके से लूटा गया। महमूद गजनवी से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक, और अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की धार्मिक आस्थाओं, सांस्कृतिक धरोहरों और आर्थिक स्तंभों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. उत्सा पटनायक का आकलन है कि 1765 से 1938 तक $45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति ब्रिटेन द्वारा भारत से लूटी गई। यह विश्व इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक लूट मानी जाती है।
आज़ादी के बाद: क्या बदला?
स्वतंत्रता के बाद भारत ने कई स्तरों पर अपने खोए हुए गौरव की पुनर्स्थापना की कोशिश की। 2021 से 2023 के बीच, भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन से 200 से अधिक सांस्कृतिक धरोहरों को वापस मंगवाया, जिनमें 10वीं सदी की नटराज मूर्ति और 12वीं सदी की बुद्ध प्रतिमाएं प्रमुख थीं।
हालांकि कोहिनूर जैसे प्रतीकात्मक रत्नों को वापस लाने के प्रयासों को अब भी ब्रिटेन से विरोध झेलना पड़ रहा है।
कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएँ
ऐतिहासिक संपत्तियों की वापसी में सबसे बड़ी बाधा है—अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अस्पष्टता। 1970 के यूनेस्को कन्वेंशन में आधुनिक काल की लूट के लिए कुछ प्रावधान हैं, परंतु ऐतिहासिक लूट को लेकर वैधानिक स्पष्टता नहीं है।
इतिहासकार डॉ. अमिताभ घोष का मानना है कि मुगल काल से लेकर औपनिवेशिक काल तक की लूट का कोई व्यापक दस्तावेजीकरण नहीं हुआ, जिससे दावों की वैधता कमजोर पड़ती है। वहीं पूर्व न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण सुझाव देते हैं कि यूनेस्को के माध्यम से दबाव बनाना और 1970 कन्वेंशन को और सशक्त करना आवश्यक है।
भारत सरकार के ठोस प्रयास और नई दिशा
भारत सरकार ने न केवल सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी के लिए कूटनीतिक प्रयास किए हैं, बल्कि औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
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“किंग्सवे” का नाम बदलकर “कर्तव्यपथ”
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इंडिया गेट पर ब्रिटिश राजा की प्रतिमा की जगह नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा
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“प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति” नामक डिजिटल ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म, जो विदेशों में मौजूद भारतीय कलाकृतियों को चिह्नित कर रहा है।
क्या मुआवज़ा माँगा जा सकता है?
सांसद डॉ. शशि थरूर जैसे विद्वान समय-समय पर ब्रिटेन से औपनिवेशिक मुआवज़े की माँग करते रहे हैं। हालांकि भारत सरकार ने अब तक औपचारिक रूप से ऐसा कोई दावा नहीं किया है।
लेकिन यह सवाल समय की मांग बन चुका है—क्या भारत को केवल धरोहरें लौटाना चाहिए, या फिर ऐतिहासिक अन्याय की आर्थिक भरपाई भी मांगनी चाहिए?
आगे की राह: रणनीति, गठबंधन और शिक्षा
यदि भारत को ऐतिहासिक न्याय की दिशा में ठोस प्रगति करनी है, तो उसे तीन स्तंभों पर ध्यान केंद्रित करना होगा:
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अंतरराष्ट्रीय कूटनीति:
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यूके, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे देशों से सांस्कृतिक समझौते
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UN में “ऐतिहासिक न्याय” के लिए नियमों की माँग
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अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ साझा मोर्चा
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ऐतिहासिक शोध:
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लूट और हस्तांतरण का दस्तावेजीकरण
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भारतीय कलाकृतियों की वैश्विक उपस्थिति का डेटा
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जनसहभागिता और जागरूकता:
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पाठ्यपुस्तकों में औपनिवेशिक शोषण की जानकारी
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डिजिटल अभियानों के माध्यम से युवाओं को जोड़ना
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समाप्ति: सम्मान की पुनर्स्थापना की यह लड़ाई अभी अधूरी है
कोहिनूर हो या नटराज—यह केवल मूर्तियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति और आत्मगौरव के प्रतीक हैं। आज़ादी के 75 वर्ष बाद यह आवश्यक है कि भारत न केवल अपने गौरवशाली अतीत को लौटाए, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी बात दृढ़ता और आत्मविश्वास से रखे।
भारत का सम्मान तभी पूर्ण होगा जब उसका अतीत लौटाया जाएगा — हीरों, मूर्तियों और स्मृतियों सहित।
