अब हमें सहानुभूति नहीं, हिस्सेदारी चाहिए: भोपाल मांग रहा है री-डेवलपमेंट पैकेज
मनोज मीक
तीन दिसंबर की तारीख आते ही भोपाल की हवा में एक अनकहा बोझ तैरने लगता है। सायरन की वो आवाज़ें, भागती हुई रात और अंतहीन सन्नाटा… यह स्मृति केवल इतिहास नहीं, आज भी शहर की धमनियों में बहती टीस है।
हममें से कई लोगों ने उस दौर से आज तक के भोपाल को जिया है—त्रासदियों की श्रृंखला को भोगा है। लेकिन एक ज़िम्मेदार नागरिक और स्तंभकार होने के नाते आज ज़रूरी है कि हम केवल भावनाओं में न उलझें, बल्कि उस कड़वे आर्थिक सच को भी स्वीकार करें, जो पिछले चार दशकों से संवेदनाओं की आड़ में दबा रहा।
सच यह है कि भोपाल ने केवल अपने लोग नहीं खोए—उसने अपना समय, अपना अवसर और अपनी आर्थिक गति भी खो दी।
दृश्य विनाश बनाम अदृश्य त्रासदी: वैश्विक दोहरापन
विश्व इतिहास में जब हम औद्योगिक और परमाणु आपदाओं को देखते हैं, तो एक क्रूर विरोधाभास उभरता है।
1945 का हिरोशिमा और नागासाकी—जहाँ विनाश दिखाई देता था।
2011 का फुकुशिमा—जहाँ तबाही मलबे में बदली थी।
दुनिया ने देखा, इसलिए इन शहरों को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण मिशन मिले। जापान ने फुकुशिमा के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 187 बिलियन डॉलर का निवेश किया।
लेकिन भोपाल की त्रासदी अदृश्य थी—ज़हर हवा में था। इमारतें खड़ी रहीं, पर पीढ़ियाँ ढह गईं।
इसी ‘अदृश्यता’ ने भोपाल को उसके हक से वंचित कर दिया।
जहाँ बाकी दुनिया को री-बिल्डिंग प्लान मिले, भोपाल को केवल
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एक लंबी कानूनी लड़ाई
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और 1989 का 470 मिलियन डॉलर का अपर्याप्त समझौता मिला
यही वह ऐतिहासिक भूल थी जिसने भोपाल की अर्थव्यवस्था को दशकों तक कोमा में डाल दिया।

खोया हुआ दशक और ‘अघोषित आर्थिक नाकाबंदी’
1984 में भोपाल एक उभरता हुआ औद्योगिक शहर था।
फिर आया 1990 का दशक—आईटी क्रांति, आर्थिक सुधार और डिजिटल युग।
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बेंगलुरु आज लगभग 110 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है
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हैदराबाद 75 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है
लेकिन भोपाल?
जब देश सॉफ्टवेयर कोड लिख रहा था, भोपाल मेडिकल रिपोर्ट पढ़ रहा था।
BMJ Open (2023) के अध्ययन बताते हैं कि गैस पीड़ितों की दूसरी पीढ़ी में भी कार्यक्षमता घटी है, विकलांगता बढ़ी है।
यह केवल स्वास्थ्य संकट नहीं था—यह भोपाल के खिलाफ एक अघोषित आर्थिक नाकाबंदी थी, जिसने शहर की ह्यूमन कैपिटल को तोड़ दिया।
‘केव से कोड’ तक: भोपाल का नव-पुनर्जागरण
लेकिन भोपाल की मिट्टी में हार नहीं है।
राख के नीचे दबी चिंगारी बुझी नहीं।
आज चार दशक बाद, भोपाल कह रहा है—
“हम तैयार हैं।”
‘कमाल का भोपाल’ अभियान इसका जीवंत प्रमाण है।
भोपाल दुनिया का शायद इकलौता शहर है जो—
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केव (Cave) से
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कोड (Code) तक की यात्रा कर रहा है।
केव:
भीमबेटका की 30,000 साल पुरानी रॉक आर्ट—मानव सभ्यता का शुरुआती दस्तावेज़।
कोड:
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3707 एकड़ में नेक्स्ट जेनरेशन नॉलेज एंड एआई सिटी
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भेल टाउनशिप की भूमि का स्मार्ट इंडस्ट्रीज़ के लिए पुनर्प्रयोजन
सरकार को सौंपी गई ‘कमाल का भोपाल’ रिपोर्ट कोई सामान्य रिसर्च नहीं—यह भोपाल के भविष्य का रनवे है।
लॉजिस्टिक्स का हृदय और भारत की ग्रीन राजधानी
कर्क रेखा पर स्थित भोपाल भारत का भौगोलिक दिल है।
CREDAI के गूगल-अर्थ आधारित अध्ययन के अनुसार—
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भोपाल के 500 किमी दायरे में भारत का सबसे बड़ा लैंड-लॉक्ड अर्बन ज़ोन है
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देश के 50% से अधिक शहरी क्षेत्र 10 घंटे की दूरी पर हैं
यह लोकेशन लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के लिए बेमिसाल रणनीतिक लाभ है।
भोपाल के पास यह भी है—
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दो यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स
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राजा भोज की वैज्ञानिक जल-प्रबंधन प्रणाली
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नेशनल पार्क, टाइगर रिज़र्व और रामसर साइट्स
इसी कारण भोपाल आज भी देश की सबसे “लिवेबल” राजधानी है।
अब हमें क्या चाहिए? दया नहीं — री-डेवलपमेंट पैकेज
भोपाल अब सहानुभूति नहीं मांगता।
हम दान नहीं, निवेश और साझेदारी चाहते हैं।
हमें चाहिए—जापान और यूरोप की तर्ज़ पर एक विशेष री-डेवलपमेंट पैकेज, जो मुआवज़े के लिए नहीं बल्कि—
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वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए
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एआई, क्वांटम रिसर्च, स्किल डेवलपमेंट के लिए
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स्वास्थ्य और उत्पादकता लौटाने के लिए
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उस खोए हुए वक्त की भरपाई के लिए, जो अदालतों में जाया गया
दुनिया के निवेशकों के लिए संदेश
आपने बेंगलुरु को उभरते देखा,
गुरुग्राम और हैदराबाद की रफ्तार देखी—
अब आइए भोपाल।
यह शहर—
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सबसे खूबसूरत है
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सबसे शांत है
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और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण भी
भोपाल का अगला पन्ना अब
‘सिलिकॉन’ की चमक और ‘कमाल’ की उम्मीद से लिखा जा रहा है।
वह शहर, जो कभी अपनी सिसकियों के लिए जाना गया,
अब अपनी सक्षमता के लिए जाना जाएगा।
यही 3 दिसंबर का असली सबक है—
और यही ‘कमाल का भोपाल’ अभियान का संकल्प।
