सांदीपनी स्कूलों में 306 महिला सहायिकाओं की नियुक्ति में ‘गोलमाल’ का आरोप

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भोपाल। प्रदेश के सांदीपनी विद्यालयों में 306 महिला सहायिका (प्री-प्राईमरी हेल्पर) उपलब्ध कराने के लिए जारी किए गए कार्यादेश को लेकर लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) में गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि उद्यमिता विकास केंद्र मध्यप्रदेश (सेडमैप) के जरिए 10 माह के लिए यह मैनपॉवर उपलब्ध कराने का कार्यादेश 25 नवंबर 2025 को जारी किया गया था, लेकिन विभाग की अनुशंसा के बिना ही यह कार्य एक ऐसी आउटसोर्स एजेंसी को दे दिया गया, जिसके पास न तो इस स्तर पर मैनपॉवर सप्लाई का पूर्व अनुभव है और न ही कार्य करने की वित्तीय क्षमता।

दावा किया गया है कि यह कार्य ओम पारस मैनपॉवर सर्विस, भोपाल नामक आउटसोर्स एजेंसी को आवंटित किया गया है, जबकि उक्त एजेंसी द्वारा बिजनेस डेवलपमेंट एनेक्सचर-3 का दस्तावेज 5 दिसंबर 2025 को सेडमैप में जमा कराया गया। यानी कार्यादेश जारी होने के बाद दस्तावेज जमा होने की प्रक्रिया पर भी संदेह जताया जा रहा है।

मार्च 2025 में ही सेडमैप को दिया जा चुका था काम

विभागीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, डीपीआई द्वारा प्रदेश के सभी अधीनस्थ शाखाओं एवं कार्यालयों का कार्य पहले ही मार्च 2025 में सेडमैप को दिया जा चुका था। यह आवंटन डीपीआई विभाग द्वारा स्वयं सेडमैप से संपर्क कर किया गया था, न कि किसी इम्पेनल्ड आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से। इसके बावजूद 306 महिला सहायिकाओं की व्यवस्था के लिए अलग से ओम पारस मैनपॉवर सर्विस को कार्य सौंपे जाने पर सवाल उठ रहे हैं।

सूत्रों का कहना है कि एजेंसी के पास न तो इतनी बड़ी संख्या में कर्मियों की उपलब्धता का अनुभव है और न ही वित्तीय रूप से इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने की क्षमता। बावजूद इसके इतने संवेदनशील और बड़े कार्य का आवंटन कर देना विभागीय स्तर पर संदेह को जन्म देता है।

भ्रष्टाचार की ‘बू’, बजट में गड़बड़ी का आरोप

जानकारों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में “भ्रष्टाचार की बू” महसूस की जा रही है। आरोप है कि डीपीआई के वित्त अधिकारी द्वारा निजी स्वार्थों के चलते नियमों की अनदेखी की गई और प्रदेश सरकार द्वारा प्री-प्राईमरी हेल्पर के लिए निर्धारित बजट को नुकसान पहुंचाने की आशंका पैदा हो गई है।

यह भी आरोप लगाया गया है कि यह कार्य बिना डीपीआई विभाग की अनुशंसा के प्रदान किया गया, जो विभागीय प्रक्रिया और पारदर्शिता पर सीधे सवाल खड़े करता है।

नोडल अधिकारी ने कॉल रिसीव नहीं किया

मामले में स्थिति स्पष्ट करने के लिए सेडमैप के नोडल अधिकारी पंकज ठाकुर से मोबाइल पर संपर्क साधने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। इसके चलते विभागीय पक्ष और प्रक्रिया से जुड़ा स्पष्ट जवाब सामने नहीं आ सका है।

वित्त अधिकारी ने जानकारी देने से किया इनकार

इस मुद्दे को लेकर लोक शिक्षण संचालनालय में वर्षों से पदस्थ वित्त अधिकारी राजेश मौर्य से जानकारी लेने के लिए संपर्क किया गया। हालांकि उन्होंने इस विषय पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। वित्त अधिकारी ने कहा कि “आप ऑफिस आकर बात करें”, जिससे यह संकेत मिला कि अधिकारी फिलहाल सार्वजनिक रूप से मामले पर बोलने से बच रहे हैं।

सेडमैप ईडी बोले—“ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी देखता हूं”

वहीं, मामले की जानकारी सेडमैप के ईडी अमरीश अधिकारी को भी दी गई। उन्हें बताया गया कि विभाग की अनुशंसा के बिना ओम पारस मैनपॉवर सर्विस को यह कार्य प्रदान किया गया है। इस पर उन्होंने कहा कि “ऐसा नहीं हो सकता है। या तो विभाग की अनुशंसा से या फिर प्रक्रिया के आधार पर कार्य आवंटन किया गया होगा। फिर भी मैं मामले को देखता हूं।”

अब जांच की मांग, पारदर्शिता पर सवाल

पूरे मामले के सामने आने के बाद डीपीआई और सेडमैप परिसर में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। विभागीय हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किस आधार पर अनुभवहीन और वित्तीय रूप से अयोग्य बताई जा रही आउटसोर्स एजेंसी को इतना बड़ा काम सौंप दिया गया

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह केवल सरकारी प्रक्रिया की साख पर नहीं बल्कि प्री-प्राईमरी शिक्षा व्यवस्था और उसके बजट पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

अब जरूरत इस बात की है कि कार्य आवंटन प्रक्रिया, दस्तावेजों की जांच, पात्रता शर्तों और विभागीय अनुशंसाओं की स्थिति सार्वजनिक की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह निर्णय नियमों के तहत हुआ या फिर इसमें किसी प्रकार की अनियमितता हुई है।

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