“बैंकों का निजीकरण नहीं, जनता की संपत्ति की सुरक्षा चाहिए” — यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स का सरकार को दो-टूक संदेश

“बैंकों-का-निजीकरण-नहीं,-जनता-की-संपत्ति-की-सुरक्षा-चाहिए”-—-यूनाइटेड-फोरम-ऑफ-बैंक-यूनियन्स-का-सरकार-को-दो-टूक-संदेश

विवेक झा, भोपाल/ नई दिल्ली।
यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (UFBU) — जो देशभर के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के नौ प्रमुख अधिकारी एवं कर्मचारी संगठनों का संयुक्त मंच है — ने वित्त मंत्री के हालिया वक्तव्य पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
UFBU ने वित्त मंत्री द्वारा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दिए गए भाषण को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है और इसे बैंक निजीकरण के अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में बताया है।

4 नवंबर 2025 को हुए डायमंड जुबली वैलेडिक्टरी लेक्चर में एक छात्र के सवाल के जवाब में वित्त मंत्री ने यह संकेत दिया था कि निजीकरण से आम जनता को नुकसान नहीं होगा।
UFBU ने इस टिप्पणी को “भ्रमित करने वाला और राष्ट्रहित के विरुद्ध” बताते हुए कहा कि —

“सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही वह स्तंभ हैं जिन्होंने देश में वित्तीय समावेशन, सामाजिक न्याय आधारित ऋण प्रणाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। इन बैंकों को निजी हाथों में सौंपना न केवल अनुचित है बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए घातक भी है।”

राष्ट्रीय विकास के प्रतीक रहे हैं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक

UFBU ने याद दिलाया कि वर्ष 1969 की राष्ट्रीयकरण नीति ने देश के आर्थिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया था।
पहले बैंक केवल उद्योगपतियों और बड़े व्यवसायिक घरानों तक सीमित थे, लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद किसानों, मजदूरों, महिलाओं, लघु व्यवसायों, कमजोर वर्गों और ग्रामीण नागरिकों तक बैंकिंग सेवाएँ पहुँचीं।

फोरम ने कहा —

  • पहले केवल कुछ हजार शहरी शाखाएँ थीं, आज लाखों गाँवों में बैंक सेवाएँ उपलब्ध हैं।

  • प्राथमिकता क्षेत्र ऋण, कृषि ऋण, एससी/एसटी योजनाएँ, स्वयं सहायता समूह, छात्र ऋण, एमएसएमई और कल्याणकारी योजनाएँ — ये सब सार्वजनिक बैंकों की वजह से संभव हो पाया।

  • महामारी, आर्थिक मंदी और वैश्विक संकट के दौरान जब निजी बैंक जोखिम से पीछे हटे, तब सार्वजनिक बैंक मजबूती से देश के साथ खड़े रहे।

निजीकरण के खतरे और उसके दुष्परिणाम

UFBU ने चेतावनी दी कि बैंक निजीकरण की दौड़ केवल मुनाफे के लिए होगी, न कि जनता की सेवा के लिए।
फोरम के अनुसार —

  • निजी बैंक केवल लाभकारी क्षेत्रों में ऋण देंगे और ग्रामीण, कमजोर वर्गों की उपेक्षा करेंगे।

  • वे घाटे वाली शाखाएँ बंद करेंगे, शुल्क बढ़ाएँगे और कर्मचारियों को ठेका प्रणाली में बदल देंगे।

  • इससे रोज़गार की अस्थिरता, आरक्षण में कटौती, ट्रेड यूनियनों पर हमला और जनसेवा की हानि तय है।

  • “जन धन योजना, DBT, पेंशन और मनरेगा भुगतान — ये सभी कार्य लगभग पूरी तरह सार्वजनिक बैंकों द्वारा किए जाते हैं। निजी बैंक इन जिम्मेदारियों से बचते हैं।”

इतिहास बताता है — निजी बैंक असफल रहे, जनता को बचाया PSB ने

UFBU ने याद दिलाया कि देश में कई निजी बैंक— जैसे यस बैंक, लक्ष्मी विलास बैंक, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक — वित्तीय संकट में डूबे और अंततः सार्वजनिक बैंकों के सहयोग से ही ग्राहकों को राहत मिली।
फोरम ने सवाल उठाया —

“अगर पूरी व्यवस्था निजी हाथों में होगी तो ऐसे समय में जनता की जमा राशि की सुरक्षा कौन करेगा?”

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बैंकों की जवाबदेही संसद, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और जनता के प्रति है, जबकि निजी बैंक केवल अपने शेयरधारकों को जवाबदेह होते हैं।

‘प्रोफेशनलाइजेशन’ के नाम पर निजीकरण नहीं चलेगा

UFBU ने स्पष्ट किया कि बैंकिंग सुधारों के लिए निजीकरण की आवश्यकता नहीं है
बेहतर संचालन, पारदर्शिता, पूंजी निवेश, तकनीकी सुधार और मानव संसाधन विकास — इन सबके जरिए पेशेवर बैंकिंग को सशक्त बनाया जा सकता है, बिना सार्वजनिक स्वामित्व खत्म किए।

“सार्वजनिक बैंक हैं राष्ट्रीय संपत्ति, इन्हें बेचा नहीं जा सकता”

UFBU ने अपनी मांगें रखते हुए कहा —

  1. केंद्र सरकार यह स्पष्ट आश्वासन दे कि किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का निजीकरण नहीं किया जाएगा।

  2. सरकार को सार्वजनिक बैंकों को पूंजी सहायता, तकनीकी आधुनिकीकरण और पारदर्शी प्रशासनिक प्रणाली से सशक्त बनाना चाहिए।

  3. किसी भी ऐसे निर्णय से पहले जन परामर्श और संसदीय बहस आवश्यक है जो जनता, जमाकर्ताओं या कर्मचारियों के हितों को प्रभावित करता हो।

जनता के साथ खड़ा है बैंकिंग संगठन

UFBU ने अपने वक्तव्य में कहा —

“हम किसानों, मजदूरों, पेंशनरों, छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों के साथ हैं। बैंक जनता की संपत्ति हैं, इन्हें निजी मुनाफे के लिए नहीं बेचा जा सकता।”

फोरम ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक बैंक केवल व्यावसायिक संस्थान नहीं हैं, बल्कि ये कल्याणकारी संस्थान हैं जो देश के आर्थिक ताने-बाने को एकजुट रखते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती और सामाजिक संतुलन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका को UFBU ने “राष्ट्रीय दायित्व” बताया है। फोरम का कहना है कि—

“बैंकिंग मुनाफे का नहीं, विश्वास का व्यवसाय है। और इस विश्वास की नींव जनता की संपत्ति, यानी सार्वजनिक बैंकों पर टिकी है।”

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