“भोपाल 2047” का विज़न : शिक्षा सुधार और राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका पर गहन मंथन

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भोपाल। आने वाले दो दशकों में राजधानी भोपाल किस रूप में विकसित होगी और मेट्रोपोलिटन शहर बनने की दिशा में शिक्षा व राष्ट्रीय संस्थानों की क्या भूमिका होगी — इसी सवाल पर रविवार को भोपाल इंटरनेशनल सेंटर ने एक व्यापक परिसंवाद आयोजित किया। विषय था — “नागरिक शिक्षा विज़न : मेट्रोपोलिटन भोपाल 2047”

शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर हुए इस आयोजन ने शहर के शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, राष्ट्रीय संस्थानों के निदेशकों और शिक्षा क्षेत्र में काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं को एक साझा मंच पर लाकर खड़ा किया। केंद्र के संस्थापक, स्वतंत्र पत्रकार व डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार शशिधर कपूर ने इस विज़न को शिक्षा व्यवस्था का “पूरक” और “अनुपूरक” बताया, न कि विकल्प। उन्होंने कहा कि यदि भोपाल का विकास बिना ठोस योजना के दिल्ली-एनसीआर की तरह हुआ तो यहाँ भी अव्यवस्थित विस्तार और भीड़भाड़ की समस्या खड़ी हो जाएगी।

शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल

परिसंवाद का पहला सत्र शिक्षा और उसके विज़न को लेकर था। अध्यक्षता करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति शरतचंद्र बैहार ने कहा — “विज़न केवल आंकड़ों का जोड़-घटाव नहीं है, बल्कि कल्पना और विचारों पर आधारित नैरेटिव है। शिक्षा का असली लक्ष्य अच्छे इंसान बनाना है, डिग्री और नौकरी तो गौण पहलू हैं।”

ग्रीन वैली स्कूल-काॅलेज की निदेशक मीणा यादव ने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देने पर बल दिया और नई शिक्षा नीति को सकारात्मक कदम बताया। श्री भवन भारती पब्लिक स्कूल की सह निदेशक हिना वार्ष्णेय राउत ने कहा कि यदि सभी छात्रों को समान अवसर और सुविधाएं दी जाएं तो विपरीत परिस्थितियों में भी वे चमक सकते हैं।

स्वयंसेवी संस्था एकलव्य के चेतन जैन ने कहा कि शिक्षा सुधार में छात्रों का फीडबैक अहम है। वहीं एक्शन डी एड के प्रवीण महोपे ने बालिका शिक्षा की चिंताजनक स्थिति पर रोशनी डाली और कहा कि खासकर आदिवासी अंचलों में हालत बेहद दयनीय है।

राष्ट्रीय संस्थानों की ज़िम्मेदारी

दूसरे सत्र का विषय था — “भोपाल में राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका और योगदान”। अध्यक्षता जागरण यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और आईआईएफएम के संस्थापक सदस्य प्रो. पी.के. बिस्वास ने की। उन्होंने कहा कि भोपाल में राष्ट्रीय संस्थानों की संख्या भले ही अधिक हो, लेकिन अधिकांश नए हैं और अभी उनकी भूमिका सीमित है। ज़रूरत है क्षमता संवर्धन और शोध को बढ़ावा देने की।

स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के सौरभ पोपली ने शिक्षा पर व्यावसायिक घरानों के कब्ज़े पर चिंता जताई। राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान की निदेशक प्रो. विद्या राकेश ने कहा कि डिज़ाइन का दायरा इतना व्यापक है कि वह जीवन के लगभग हर पहलू को प्रभावित करता है। उन्होंने विज़न की संधारण प्रक्रिया में छात्रों और अन्य हितधारकों की भागीदारी पर जोर दिया।

इग्नू के क्षेत्रीय संयुक्त निदेशक आशुतोष उपाध्याय ने भोपाल के संदर्भ में दो विशेष पाठ्यक्रम — जराचिकित्सा (Geriatrics) और गणित शिक्षण पद्धति — का ज़िक्र किया। उन्होंने यह भी बताया कि सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में इग्नू की अध्ययन सामग्री उपयोगी साबित हो रही है।

भोपाल मॉडल की परिकल्पना

परिसंवाद में यह सहमति बनी कि भोपाल को 2047 तक मेट्रोपोलिटन शहर के रूप में विकसित करने के लिए केवल वर्तमान ढांचे को “चार गुना” कर देना समाधान नहीं होगा। दिल्ली-एनसीआर के उदाहरण से सीख लेते हुए संतुलित और योजनाबद्ध विस्तार जरूरी है। शशिधर कपूर ने कहा कि भोपाल का मॉडल अलग होना चाहिए और इस दिशा में यह परिसंवाद एक शुरुआत है।

नई पहल : फिल्मकारों के लिए प्रतियोगिता

कार्यक्रम का समापन भोपाल इंटरनेशनल सेंटर की सह-संस्थापिका, फिल्मकार और मीडियाकर्मी प्रीति त्रिपाठी के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। उन्होंने घोषणा की कि भोपाल के लघु और डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसके परिणाम 1 नवंबर, मध्यप्रदेश दिवस पर घोषित होंगे, जब नागरिक मेट्रोपोलिटन प्लान भी जारी किया जाएगा।

यह परिसंवाद केवल एक शैक्षणिक चर्चा नहीं रहा, बल्कि यह संकेत भी दिया कि “भोपाल 2047 विज़न” शहर की भविष्य की दिशा तय करने वाला सामाजिक आंदोलन बन सकता है। शिक्षा सुधार, बालिका शिक्षा, समान अवसर और राष्ट्रीय संस्थानों की सक्रिय भूमिका — ये सभी मिलकर भोपाल को एक संतुलित, शिक्षित और जागरूक मेट्रोपोलिटन शहर में बदलने का आधार बन सकते हैं।

एक नज़र में – “भोपाल 2047” परिसंवाद

  • आयोजन : भोपाल इंटरनेशनल सेंटर द्वारा रविवार को स्थानीय क्लब में

  • विषय : “नागरिक शिक्षा विज़न : मेट्रोपोलिटन भोपाल 2047”

  • अवसर : शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या, थीम “अगली पीढ़ी के शिक्षार्थियों को प्रेरित करना”

  • भागीदारी : कुलपति, प्राचार्य, राष्ट्रीय संस्थानों के निदेशक, शिक्षाविद, स्वयंसेवी संस्थाएँ

पहला सत्र – शिक्षा व्यवस्था और विज़न

  • शिक्षा का उद्देश्य नौकरी/डिग्री नहीं, अच्छे इंसान बनाना : शरतचंद्र बैहार

  • सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता : मीणा यादव

  • समान अवसर और सुविधाएं जरूरी : हिना वार्ष्णेय राउत

  • छात्रों का फीडबैक अहम : चेतन जैन

  • बालिका शिक्षा की खराब स्थिति पर चिंता : प्रवीण महोपे

दूसरा सत्र – राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका

  • संस्थानों की भूमिका अभी सीमित, ज़रूरत क्षमता संवर्धन और शोध की : प्रो. पी.के. बिस्वास

  • शिक्षा पर व्यावसायिक घरानों का प्रभाव चिंता का विषय : सौरभ पोपली

  • डिज़ाइन का दायरा जीवन के हर पहलू तक : प्रो. विद्या राकेश

  • जराचिकित्सा और गणित शिक्षण पद्धति जैसे विशेष पाठ्यक्रमों की चर्चा : आशुतोष उपाध्याय

मुख्य निष्कर्ष

  • भोपाल का विकास केवल ढांचा “चार गुना” बढ़ाकर नहीं किया जा सकता

  • दिल्ली-एनसीआर की गलतियों से सीखना होगा

  • भोपाल का अलग और संतुलित मॉडल तैयार करने की जरूरत

नई पहल

  • लघु और डॉक्यूमेंट्री फिल्मकारों के लिए विशेष प्रतियोगिता

  • परिणाम 1 नवंबर, मध्यप्रदेश दिवस पर घोषित होंगे

  • इसी दिन “नागरिक मेट्रोपोलिटन प्लान” का भी प्रकाशन होगा

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