विवेक झा, भोपाल। देश की ज्वेलरी इंडस्ट्री में इन दिनों BIS हॉलमार्किंग और HUID (हॉलमार्क यूनिक आइडेंटिफिकेशन) व्यवस्था को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। खासतौर पर हाथ से निर्मित (हैंडमेड) ज्वेलरी से जुड़े कारीगरों, व्यापारियों और रिटेलर्स ने मौजूदा नियमों को व्यवहारिक बनाने की मांग उठाई है। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि मशीन कास्टिंग और हैंडमेड ज्वेलरी की निर्माण प्रक्रिया अलग होने के कारण शुद्धता में मामूली अंतर स्वाभाविक है, जिसे नियम बनाते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए।
हैंडमेड बनाम मशीन कास्टिंग : अंतर समझना जरूरी
मप्र सराफा एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष संजीव गर्ग गांधी ने बताया कि मशीन कास्टिंग ज्वेलरी सामान्यतः “इन-हाउस” तैयार होती है, जहां पूरी प्रक्रिया एक ही स्थान पर नियंत्रित ढंग से की जाती है। ऐसे में शुद्धता के मानकों में अंतर आने की संभावना कम रहती है।
इसके विपरीत हाथ से बनी ज्वेलरी, जो भारत की पारंपरिक कारीगरी की पहचान है, कई चरणों और अलग-अलग स्थानों से गुजरती है। गोली, सतफूली, तार, पत्तरा, डाई, मीना, छिलाई, पॉलिश, नग सेटिंग, कुंदन, जड़ाऊ जैसी प्रक्रियाएं विभिन्न कारीगरों और इकाइयों में होती हैं। हर चरण में धातु की मेल्टिंग और मिश्रण के कारण शुद्धता में कुछ “पॉइंट” का अंतर आना स्वाभाविक बताया जा रहा है।
गांधी का तर्क है कि जब तक संपूर्ण उत्पादन एक ही स्थान (इन-हाउस) पर नहीं होगा, तब तक शुद्धता में सूक्ष्म अंतर संभव है।
BIS सैंपल फेल होने पर बढ़ रहा नुकसान
व्यापारियों का कहना है कि जब BIS द्वारा सैंपल लिया जाता है और वह हैंडमेड ज्वेलरी होती है, तो मामूली अंतर के कारण सैंपल फेल हो जाते हैं। इससे व्यापारी को ज्वेलरी दोबारा गलवानी पड़ती है, जिसका सीधा नुकसान कारीगर, थोक व्यापारी और रिटेल दुकानदार—तीनों को उठाना पड़ता है।
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि चांदी की ज्वेलरी में कम से कम 1% तक का अंतर आना व्यवहारिक रूप से संभव है, इसलिए नियम बनाते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए।
ज्वेलरी हब और 80% बाजार की हिस्सेदारी
राजकोट, अहमदाबाद, आगरा, मथुरा, मुंबई और झेलम जैसे शहर देश के प्रमुख ज्वेलरी प्रोडक्शन हब माने जाते हैं। दावा किया गया है कि देश में बिकने वाली 80% से अधिक ज्वेलरी इन्हीं केंद्रों से आती है।
विशेषकर चांदी की ज्वेलरी—जैसे पायल, कमरबंद, चेन, घुंघरू और फैंसी आइटम—अलग-अलग शहरों से पुर्जे मंगवाकर तैयार किए जाते हैं। कई बार कुछ आइटम विदेशों से भी मंगाए जाते हैं, फिर फिटिंग और वाइब्रेटर पॉलिश की प्रक्रिया से गुजरते हैं। इस बहु-स्तरीय प्रक्रिया में शुद्धता में सूक्ष्म अंतर आना स्वाभाविक बताया गया है।
ग्रामीण बाजार और भारी वजन की मांग
चांदी के जेवरों में 100 ग्राम से 500 ग्राम तक वजन वाली पायल और कमरबंद की मांग मुख्यतः मध्यम, निम्न और ग्रामीण-किसान वर्ग में अधिक है। उद्योग का दावा है कि चांदी के आभूषणों में 80% से अधिक खरीदार हाथ से बनी ज्वेलरी को प्राथमिकता देते हैं।
सोने-चांदी के दामों में हालिया तेजी के कारण ज्वेलरी व्यापार का ग्राफ घटकर लगभग 40% तक सिमटने की बात भी कही गई है। ऐसे में सख्त नियमों से छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
शुद्धता मापदंड में संशोधन की मांग
उद्योग प्रतिनिधियों ने BIS से करेट के अनुसार व्यवहारिक प्रतिशत तय करने की मांग रखी है, जैसे—
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22K – 92%
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20K – 84%
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18K – 76%
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14K – 59%
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12K – 51%
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9K – 39%
उनका कहना है कि यदि हैंडमेड ज्वेलरी को इन मानकों के अनुरूप स्वीकार किया जाए तो विवाद कम होंगे और सैंपल फेल होने की स्थिति भी घटेगी।
बुलियन और मिलावट का मुद्दा
उद्योग ने बुलियन (कच्ची धातु) की शुद्धता पर भी चिंता जताई है। आरोप है कि चांदी में कैडियम और सोने में अन्य पाउडर मिश्रण आने के कारण भी HUID फेल होने की स्थिति बनती है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिबंधित पाउडर के उपयोग का उल्लेख करते हुए उद्योग ने स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी गिनाए और टेक्निकल टीम से दोबारा अध्ययन की मांग की है।
HUID की व्यवहारिकता पर सवाल
व्यापारियों का तर्क है कि यदि बुलियन को HUID कराया जाता है और बाद में कटिंग या री-प्रोसेसिंग होती है, तो एक ही उत्पाद को कई बार HUID कराने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे वजन और लागत दोनों प्रभावित होते हैं।
उद्योग का कहना है कि HUID प्रणाली किन-किन देशों में लागू है और वहां किस प्रकार की ज्वेलरी बनती है—इसका तुलनात्मक अध्ययन कर भारत में नियम लागू किए जाने चाहिए।
अंतिम बिंदु पर भी अनिवार्य हो HUID
उद्योग ने सुझाव दिया है कि मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ अंतिम विक्रय बिंदु पर भी HUID अनिवार्य किया जाए, ताकि पूरे देश में एक समान व्यवस्था लागू हो सके और अनावश्यक विवाद कम हों।
संतुलित नीति की जरूरत
ज्वेलरी उद्योग का कहना है कि वे पारदर्शिता और उपभोक्ता हितों के पक्षधर हैं, लेकिन नियम व्यवहारिक होने चाहिए। हैंडमेड ज्वेलरी भारत की पारंपरिक पहचान और निर्यात का बड़ा आधार है, ऐसे में नीति निर्माण में जमीनी वास्तविकताओं को शामिल करना आवश्यक है।
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार, BIS और ज्वेलरी संगठनों के बीच संवाद से ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जिससे उपभोक्ता सुरक्षा भी बनी रहे और पारंपरिक कारीगरों का रोजगार भी सुरक्षित रहे।
