मुंबई, 02 अप्रैल – पहले अमेरिकी आयात शुल्क और अब पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय कंपनियों की बैलेंसशीट मजबूत बनी हुई है और उनका कर्ज का अनुपात घट रहा है।
साख निर्धारक एजेंसी केयरएज रेटिंग्स की साख गुणवत्ता रिपोर्ट ‘क्रेडिट रेशियो’ के अनुसार, साख बढ़ने और घटने का अनुपात यानी क्रेडिट रेशियो वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही की तुलना में दूसरी छमाही में कम होने के बावजूद 10 साल के औसत से ऊपर बना हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी छमाही में क्रेडिट रेशियो 1.93 रहा जबकि पहली छमाही में यह 2.56 था। इस दौरान 363 कंपनियों की रेटिंग बढ़ायी गयी जबकि 188 कंपनियों की रेटिंग घटायी गयी। इस मामले में 10 साल का औसत 1.55 है।
साख घटने की दर सात प्रतिशत रही जो दस साल के औसत 10 प्रतिशत से कम है। हालांकि साख बढ़ने की दर में कमी आयी है और यह लंबी अवधि के औसत 15 प्रतिशत से घटकर फिलहाल 13 प्रतिशत रह गयी है।
केयरएज रेटिंग्स ने का कहना है कि इससे पता चलता है कि क्रेडिट प्रोफाइल में सुधार अब कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक ही सीमित हो गया है। फिर भी, रेटिंग बरकरार रखने की दर 80 प्रतिशत के उच्च स्तर पर बनी हुई है। इसका मतलब है कि बाहरी कारकों के बावजूद ज्यादातर कंपनियां अपनी स्थिति मजबूत बनाये हुए हैं।
इसका प्रमुख कारण कंपनियों द्वारा लगातार अपना कर्ज कम करने के रुझान को बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक कुल गियरिंग (कर्ज का अनुपात) घटकर महज़ 0.50 रह गया है, जो 31 मार्च 2016 को 1.04 था। यह अनिश्चितता के इस दौर में भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट की मजबूती को दर्शाता है।
केयरएज रेटिंग्स के कार्यकारी निदेशक और मुख्य साख अधिकारी सचिन गुप्ता ने कहा कि पश्चिम एशिया के बढ़ते संघर्ष ने अनिश्चितता बढ़ा दी है। चूंकि भारत ऊर्जा के लिए आयात पर बहुत निर्भर है, इसलिए लंबे समय तक चलने वाला युद्ध महंगाई बढ़ा सकता है, चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, सरकारी बजट पर दबाव पड़ सकता है और विकास की रफ्तार सुस्त हो सकती है।
केयरएज का अनुमान है कि अगर वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटकर 6.5 प्रतिशत रह सकती है और महंगाई 5.1 प्रतिशत से 5.3 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
श्री गुप्ता ने कहा, “हालांकि भारत के पास बचाव के मजबूत नीतिगत उपाय और कंपनियों की बेहतर वित्तीय स्थिति का लाभ है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वैश्विक हालात और बिगड़ने पर भी ये घरेलू उपाय ‘साख की गुणवत्ता’ को बरकरार रखने के लिए काफी होंगे। फिलहाल तो इसका जवाब ‘हाँ’ की तरफ अधिक दिख रहा है, लेकिन सुरक्षित रहने की गुंजाइश कम होती जा रही है।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि बदलते वैश्विक और भू-राजनीतिक हालात के बीच विनिर्माण और सेवा क्षेत्र का ‘क्रेडिट रेशियो’ वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी छमाही में सुधरकर 2.06 हो गया जो पहली छमाही में 1.72 था। केयरएज रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक रंजन शर्मा के अनुसार इसमें सबसे अधिक योगदान फार्मा, वाहनों के कलपुर्जे, रियल एस्टेट लीजिंग, कैपिटल गुड्स और कृषि-खाद्य उत्पाद क्षेत्र की मझौली कंपनियों और सेवा क्षेत्र में होटल तथा अस्पतालों का रहा।
छोटी कॅमोडिटी कारोबार और वितरण कंपनियों, सीफूड निर्यातक और कागज एवं उनके उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को साख में कमी की सबसे अधिक मार झेलनी पड़ी है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान युद्ध लंबा चला तो कई उद्योगों की कमाई पर बुरा असर पड़ सकता है। आमतौर पर, एमएसएमई पर इन झटकों का सबसे अधिक खतरा है, हालांकि भारतीय कंपनियों के पास कम कर्ज होना फिलहाल कुछ राहत देगा।
अमेरिकी आयात शुल्क और अब पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय कंपनियों की बैलेंसशीट मजबूत : रिपोर्ट
